शीर्षक: चाय के कप में बचा हुआ प्यार
अध्याय 3: धूप में उगी हुई बारिश
(करण और संध्या की कहानी का अगला पन्ना)
"प्यार कभी खत्म नहीं होता... बस कभी-कभी बारिश की तरह छिप जाता है। और फिर धूप में चमक उठता है —बूँदों से इंद्रधनुष बुनकर।"
बरसात के बाद की वह धूप अब रोज़ आने लगी थी। घर की खिड़कियों से टकराती, चाय के कप में तैरती, और हम दोनों के बीच की खामोशी को एक नई भाषा देती। पर अब यह भाषा सिर्फ शब्दों की नहीं थी — यह टूटे मग में चाय का स्वाद थी, डायरी के कोने पर लिखी नई पंक्तियाँ थीं, और रात के अँधेरे में टिमटिमाती मोमबत्ती की लौ थी।
करण ने आज चाय में थोड़ी अदरक डाली — संध्या को सर्दी के लक्षण थे। वह मग उठाया, जिस पर चिड़िया की तस्वीर अब और धुंधली हो गई थी, पर संध्या की उँगलियों के निशान उस पर साफ़ थे। वह बेडरूम में दाखिल हुआ तो देखा, संध्या खिड़की के पास खड़ी, बाहर झरते सूरज को निहार रही थी। उसकी चाय का कप अभी भरा हुआ था। "सर्दी बढ़ गई है क्या?" करण ने पूछा, मग उसके हाथ में थमाते हुए। संध्या ने चाय की भाप को सूँघा, "अदरक डाली है? याद आ गया न... पहले तुम ऐसे ही बनाते थे जब मैं बीमार पड़ती।" "हाँ... और तुम कहती थीं कि 'ये दवा नहीं, प्यार है।'" करण मुस्कुराया। एक पल रुककर संध्या ने उसकी ओर देखा, "कल रात... तुमने डायरी में कुछ लिखा था न? मैंने देखा।"करण का चेहरा थोड़ा तन गया, "तुमने पढ़ लिया?" "नहीं। बस देखा कि पन्ना खुला था।" संध्या ने चाय की चुस्की ली, "पर अब पूछ रही हूँ।" वह सवाल हवा में लटक गया — जैसे बारिश से पहले का भारीपन। करण ने खिड़की के शीशे पर जमी भाप पर उँगली से एक छोटा-सा हृदय बना दिया।
करण का दिन भागता हुआ जा रहा था — मीटिंग्स, ईमेल्स, डेडलाइन्स। फोन बजा तो उसने बिना देखे ही कट कर दिया। दोपहर में जब थोड़ी फुर्सत मिली, तो उसने मिस्ड कॉल देखी — संध्या की। वह चौंका। संध्या कभी दिन में फोन नहीं करती थी। उसने तुरंत रीडायल किया। "हलो? सब ठीक है?" करण की आवाज़ में घबराहट थी। "हाँ... बस तुम्हें बताना था," संध्या की आवाज़ धीमी थी, "आज सुबह वाली बात... माफ़ करना। तुम्हारी डायरी मैंने छू भी नहीं थी।" करण स्तब्ध रह गया। वह तो भूल ही गया था। "अरे नहीं, मैं तो..." "तुमने लिखा होगा कोई नई कविता?" संध्या ने हँसते हुए कहा, "शाम को सुनाओगे?"करण ने राहत की साँस ली, "हाँ... एक छोटी सी। बारिश के बारे में।" "मुझे पता था।" संध्या की आवाज़ में वही पुरानी शरारत लौट आई थी, "तुम्हारा दिमाग़ हमेशा बादलों में घूमता है।" फोन कट हुआ, पर करण के चेहरे पर एक मुस्कान अटकी रही। उसने अपने फोन की नोट्स खोली — "संध्या को शाम को फूल लाने हैं — गुलाब नहीं, कमल। उसे तालाब वाले कमल पसंद हैं।"
शाम को बच्चे होमवर्क कर रहे थे जब संध्या ने डायरी निकाली। "आज किसकी बारी है?" उसने करण की ओर देखा। "तुम्हारी," करण ने कहा, "पिछली बार तुमने 'धूप' वाली लाइन लिखी थी।" संध्या ने पन्ना पलटा। वहाँ करण की नई कविता थी:
"बारिश तो बहुत गिरी... पर तुम्हारी याद नहीं धुली।
हर बूँद में तेरा नाम था... हर बादल में तेरी साँस।
और जब धूप निकली... तो पता चला
तेरा प्यार तो मेरी हथेली पर लिखा हुआ इक निशाँ था।"
संध्या ने पढ़ा तो उसकी आँखें चमक उठीं। "तुम तो कवि ही हो।" "और तुम?" करण ने कलम उसकी ओर बढ़ाई। तभी नीता और आर्यन (उनका 8 साल का बेटा) कमरे में घुस आए। "मम्मा-पापा! ये डायरी क्या है? हमें भी दिखाओ!" नीता ने उछलकर डायरी पकड़ ली। "अरे नहीं! ये हमारी प्राइवेट है!" संध्या ने हँसते हुए डायरी छीनी। "प्राइवेट? मतलब लव लेटर्स?" आर्यन ने मासूमियत से पूछा। करण ने उसे गोद में उठा लिया, "हाँ बेटा... पुराने लव लेटर्स। जब हम तुम्हारी उम्र के थे।" नीता ने नाक सिकोड़ी, "युक! पर अब तो आप लोग बूढ़े हो गए।" संध्या और करण की नज़रें मिलीं — और दोनों ऐसे हँसे जैसे बरसों नहीं हँसे थे।
अगले दिन करण ऑफिस से लौटा तो संध्या के चेहरे पर थोड़ी निराशा थी। "कमल नहीं मिले?" उसने पूछा। करण को याद आया — वो नोट! वह भूल गया था। "अरे... माफ़ करना। ऑफिस में..." "कोई बात नहीं," संध्या ने मुस्कुराने की कोशिश की, पर निराशा आँखों में तैर रही थी। रात को करण बिस्तर पर करवटें बदलता रहा। "कैसे भूल गया? वो इंतज़ार कर रही थी..." उसने फैसला किया — वह अभी जाएगा। रात के 11 बजे वह चुपचाप उठा, कार की चाबी ली और निकल पड़ा। उसे पता था — शहर के बाहरी इलाके में एक नर्सरी रात भर खुली रहती है। वापसी में उसके हाथ में सिर्फ कमल नहीं थे — एक छोटा सा कैक्टस भी था, जिस पर लाल फूल खिले थे। संध्या को कैक्टस पसंद थे — "ये बिना पानी के भी जी लेते हैं... जैसे हमारा प्यार," वह कहा करती थी। करण ने धीरे से दरवाजा खोला तो देखा — संध्या सोफे पर सोई हुई थी, उसके हाथ में डायरी खुली थी। शायद वह इंतज़ार करते-करते सो गई। करण ने कमल उसके पैरों के पास रखे, और कैक्टस टेबल पर। फिर उसने एक कागज़ निकाला — डायरी का एक पन्ना फाड़कर — और लिखा:
"माफ़ करना भूल गया... पर तेरी याद नहीं भूली।
ये फूल नहीं... मेरी माफ़ी हैं।
और ये कैक्टस? वो हिम्मत है जो तूने दी...
बिना पानी के भी प्यार को जिलाए रखने की।"
वह नोट कमलों के बीच रखकर जाने ही वाला था कि संध्या की आँख खुल गई। "ये सब...?" उसने आँखें मलते हुए पूछा। "तुम्हारे लिए। माफ़ी माँगने के लिए।" करण शर्मिंदा खड़ा था संध्या ने कमल उठाये — ताज़े, ओस से भीगे हुए। "तुम रात में अकेले गए? इतनी दूर?" "हाँ... पर तुम सो रही थीं। मैं..." "मैं जाग गई थी जब तुम गए थे," संध्या ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैंने तुम्हें देखा। पर सोचा... चुप रहूँ।" वह उठी और करण के पास आई। उसके हाथ में वो कागज़ था जो करण ने लिखा था। "तुम्हारी कविता... बहुत खूबसूरत है।" "पर सच्ची है," करण ने कहा, "तुम्हें याद है? कॉलेज में जब मैं तुम्हें पहली बार मिला था, तो तुमने कहा था — 'तुम्हारी आँखों में ईमानदारी है।' मैंने वो ईमानदारी खो दी थी। पर अब... वापस लाना चाहता हूँ।" संध्या ने उसका हाथ थाम लिया — पहली बार इतने जानबूझकर। "वो कभी गई ही नहीं थी। बस... कहीं छिप गई थी। जैसे मेरा प्यार।"
एक शनिवार को अचानक मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। बच्चे छत पर भागे — पानी में नहाने। करण और संध्या भी उनके साथ गए। आसमान गरज रहा था, बिजली चमक रही थी, और चारों तरफ पानी ही पानी। "मम्मा! देखो! मेरी नाव!" आर्यन ने कागज़ की नाव बनाकर पानी में डाली। नीता ने करण का हाथ पकड़ा, "पापा! कहानी सुनाओ! बारिश वाली!" करण और संध्या छत के शेड में बैठ गए। बच्चे उनके पास सिमट आए। करण ने कहानी शुरू की — एक राजा और रानी की जिनका प्यार बारिश की वजह से टूट गया, फिर धूप की वजह से जुड़ा। बच्चे मुग्ध होकर सुन रहे थे। संध्या करण की ओर देख रही थी — उसकी आँखें चमक रही थीं, जैसे कॉलेज के दिनों में जब वह डिबेट में बोलता था। कहानी खत्म हुई तो नीता ने पूछा, "पापा... ये राजा-रानी तुम और मम्मा तो नहीं?" करण हँसा, "शायद हाँ। पर हमारी कहानी अभी खत्म नहीं हुई।" "क्यों?" आर्यन ने पूछा। "क्योंकि..." संध्या ने करण का हाथ थामा, "हमारी कहानी अब नई शुरुआत कर रही है। बारिश के बाद धूप जैसे।"तभी एक तेज़ बिजली चमकी और बच्चे डरकर उनसे चिपट गए। करण ने संध्या को देखा — वह मुस्कुरा रही थी। उसने अपना हाथ उसके कंधे पर रख दिया। दूरी अब सिर्फ इंच भर थी।
उस रात बच्चे सो गए तो करण और संध्या डायरी लेकर बैठे। "आज तुम्हारी बारी है," संध्या ने कहा। "नहीं... आज हम साथ लिखेंगे," करण ने कलम उठाई। उसने लिखा:
"बारिश ने हमें भिगोया... धूप ने सुखाया। और बीच में... हमने पाया —
फिर उसने कलम संध्या को दे दी। संध्या ने आगे लिखा:
"वो प्यार जो कभी खोया नहीं था... बस कुछ देर के लिए सोया था।"
दोनों ने उसे पढ़ा तो हँस पड़े। "ये तो गाने जैसा लगा," संध्या बोली। "तो गाओ न!" करण ने चुनौती दी। संध्या ने झिझकते हुए वो पंक्तियाँ गुनगुनाईं। फिर करण भी साथ देने लगा। वह घर फिर से गूँज उठा — दो टूटे हुए स्वरों का मेल, जो शायद पहले कभी इतने सुरीले नहीं थे।
अगले हफ्ते करण पर ऑफिस का प्रेशर बढ़ गया — एक बड़ा प्रोजेक्ट डेडलाइन पर था। वह रातों को लेट करता, सुबह जल्दी चला जाता। संध्या ने देखा कि चाय का वह मग अब दोबारा धूल खाने लगा है। एक रात करण 11 बजे लौटा। संध्या उसे इंतज़ार कर रही थी। "कुछ खाओगे?" "नहीं... बस सोना है," करण थका हुआ बोला। "पर तुम्हारा तो खाना ही नहीं हुआ पूरे दिन," संध्या ने चिंतित स्वर में कहा। "पता है!" करण का स्वर तीखा हो गया, "मेरी जॉब है ये! तुम समझती नहीं!" खामोशी छा गई। करण को तुरंत अहसास हुआ — उसने ग़लत कहा। "माफ़ करना... मैं..." "नहीं... तुम सही कह रहे हो," संध्या की आवाज़ सपाट थी, "मैं नहीं समझती तुम्हारे प्रेशर को। पर क्या तुम समझते हो मेरी चुप्पी को?" वह रसोई में गई और एक प्लेट लेकर आई — उसमें उसकी पसंद की सब्ज़ी थी। "खाओ। चुपचाप।" करण ने खाना शुरू किया तो उसकी आँखें भर आईं। यह स्वाद था... वही जो उसे दुनिया भर के स्ट्रेस से बचा लेता था। "कल... मैं ऑफिस से छुट्टी ले रहा हूँ," करण ने अचानक कहा। "क्यों? प्रोजेक्ट?" "प्रोजेक्ट तो चलता रहेगा। पर हम... रुक रहे हैं।" अगली सुबह करण ने बच्चों को स्कूल से छुट्टी दिलवाई। "चलो, कहीं घूमने चलते हैं!" "कहाँ?" बच्चे उत्साहित हो गए।"वहाँ जहाँ नदी बारिश के बाद जवान होती है!" संध्या ने रहस्यमयी अंदाज़ में कहा।
वे शहर से बाहर एक नदी के किनारे पहुँचे। बारिश के बाद नदी उफान पर थी, पानी गीली मिट्टी की खुशबू लिए हुए। बच्चे किनारे खेलने लगे। करण और संध्या एक पत्थर पर बैठ गए। "याद है?" करण ने पूछा, "हमारे हनीमून में हम ऐसी ही नदी पर गए थे।" "हाँ... और तुमने कहा था कि 'नदी हमारे प्यार जैसी है — कभी शांत, कभी उग्र, पर हमेशा बहती रहती है।'" संध्या मुस्कुराई। "और आज...?" करण ने उसकी ओर देखा। "आज भी वही कहूँगी। बस... इसमें बारिश का जोश जुड़ गया है।" तभी आर्यन ने पुकारा, "पापा! मम्मा! देखो! इंद्रधनुष!" आकाश में सात रंगों का एक विशाल धनुष छा गया था — बारिश और धूप का मेल। करण ने संध्या का हाथ पकड़ लिया। इस बार कोई हिचक नहीं थी। "ये इंद्रधनुष... हमारे रिश्ते जैसा है," संध्या फुसफुसाई। "क्यों?" "क्योंकि ये तभी बनता है जब बारिश और धूप साथ होते हैं। अकेले नहीं।" घर लौटकर सब थके हुए थे, पर खुश। बच्चे सो गए तो करण और संध्या डायरी लेकर बैठे। "आज क्या लिखें?" संध्या ने पूछा। "हमारी नई शुरुआत के बारे में," करण ने कहा। इस बार संध्या ने पहले लिखा:
"नदी किनारे बैठे थे हम... जब इंद्रधनुष ने कहा —
'डरो मत... टूटे हुए रंग भी जुड़ सकते हैं।
बस थोड़ी धूप चाहिए... थोड़ी पानी की बूँदें।
और दो दिल... जो मिलकर प्रार्थना करें कि —
हम फिर से बन सकें सात रंगों का एक साथी।"
करण ने उसे पढ़ा तो उसकी आँखें नम हो गईं। "तुम सच में कवयित्री हो।" "नहीं... बस एक औरत हूँ जिसने प्यार को फिर से पढ़ना सीखा है।" उस रात वे साथ सोए — नहीं, सिर्फ शारीरिक रूप से नहीं। उनकी आत्माएँ भी उसी बिस्तर पर आराम कर रही थीं। करण का हाथ संध्या के बालों में था, और संध्या का सिर उसके कंधे पर। दूरी अब शून्य थी।
अगली सुबह करण ने फिर वही टूटा मग निकाला। पर आज संध्या ने उसे रोक दिया। "रुको... आज मैं बनाउँगी चाय।" वह रसोई में गई। करण ने देखा — वह नया कैक्टस खिड़की पर रखा था, और उस पर लाल फूल अब भी खिले हुए थे। संध्या चाय बनाते हुए गुनगुना रही थी — कल रात की वही पंक्ति: "डरो मत... टूटे हुए रंग भी जुड़ सकते हैं..." चाय तैयार हुई तो संध्या ने दो कप निकाले — एक टूटा मग, और एक नया कप जिस पर इंद्रधनुष बना था। "ये तुम्हारे लिए," उसने नया कप करण को दिया। "पर ये तो..." "हमारी नई शुरुआत का प्रतीक है," संध्या मुस्कुराई, "और ये टूटा मग? हमारे बीतें हुए पलों का... जो अब भी खूबसूरत हैं।" करण ने चाय पी। स्वाद वही था, पर आज कुछ और मीठी लगी। "कल शाम... हम फिर डायरी लिखेंगे न?" "हर शाय," संध्या ने उसका हाथ थाम लिया, "क्योंकि हमारी कहानी अब हर रोज़ नई लिखी जाएगी। एक साथ।" और बाहर धूप निकल आई — नई सुबह, नई धूप। पर इस बार वह धूप सिर्फ खिड़की पर नहीं थी... वह उन दोनों के दिलों के अंदर भी चमक रही थी।
रविवार की सुबह नीता ने पुरानी एल्बम निकाल ली। “पापा, मम्मा की शादी की फोटो दिखाओ न!” करण और संध्या सोफे पर बैठे थे, एक कप में चाय बाँटते हुए। एल्बम के पन्ने पलटे — हल्दी लगे चेहरे, हँसती आँखें, और वो पुरानी तस्वीर जिसमें करण की जेब में गुलाब रखा था।
“पापा! आप तो हीरो लग रहे हो!” आर्यन चहका।
“और मम्मा तो रानी जैसी!” नीता मुस्कुराई।
संध्या ने करण की ओर देखा — जैसे उन शब्दों ने उसे फिर से वही बना दिया हो… रानी।
“देखो ये,” करण ने कहा, “जब तुम्हारी मम्मा ने पहली बार मुझे राखी बाँधी थी… गलती से।”
“क्या?” दोनों बच्चे हँसने लगे।
“हाँ! फिर मुझे डर लगा कि दोस्ती ही रह जाएगी।”
“और फिर?” नीता ने पूछा।
“फिर…” संध्या ने कहा, “इसने मुझे डायरी दी — जिसमें पहली बार मेरे लिए एक कविता लिखी थी।”
करण उठकर अंदर गया, और कुछ मिनट बाद वो डायरी लेकर लौटा — वही पुरानी, पीली होती पन्नों वाली।
“यह पन्ना,” उसने कहा, “तुम्हारी मम्मा के लिए लिखा था — उस राखी के बाद।”
उसने पढ़ा:
"तेरा नाम बाँध दिया है कलाई पर,
अब डरता हूँ... कहीं ये रेशम दिल को न छू जाए।
पर क्या करूँ, तेरे हँसने से दिल जो धड़कने लगता है
जैसे कोई राखी नहीं, इश्क़ की डोरी बंध गई हो..."
बच्चे कुछ समझे नहीं, पर माहौल को महसूस कर लिया।
संध्या की आँखें नम हो गईं, पर मुस्कान वैसी ही रही — धीमी, गहरी।
एक शाम की बात है... करण ने ऑफिस से आकर एक पुराना कैसेट प्लेयर निकाला।“याद है ये?”
“तुम्हारी आवाज़ रिकॉर्ड की थी इसमें,” संध्या ने चौंकते हुए कहा। उन्होंने प्ले किया — एक पुराना टेप। उसमें करण की युवा, डगमगाती आवाज़ थी:
"संध्या... अगर तुम ये सुन रही हो, तो शायद मैं तुमसे कुछ कहने की हिम्मत जुटा रहा हूँ।
तुम जब मुस्कुराती हो, तो मुझे ऐसा लगता है जैसे कोई कविता चल रही हो — बिना शब्दों के।
अगर तुम्हारा दिल कहे, तो... मेरी डायरी पढ़ लेना। वो सब तुम्हारे लिए ही है।"
संध्या की आँखें बंद हो गईं। उस पल कमरे में वक़्त ठहर गया।“मैंने पढ़ी थी,” उसने धीमे से कहा, “पर तब समझ नहीं पाई थी। आज समझ में आई है।”
करण ने उसका हाथ थाम लिया — जैसे शब्द अब ज़रूरी नहीं रहे।
बच्चे सो गए थे। करण और संध्या बालकनी में बैठे थे — सामने खामोश अँधेरा था, पर आसमान में तारे थे।
संध्या ने धीरे से कहा, “मैंने एक और कविता लिखी है।”
“डायरी में?” “नहीं… मन में।”करण मुस्कुराया। “तो बोलो न।” संध्या ने चाय का घूँट लिया और कहा:
"कभी-कभी प्यार चुप रहता है,
जैसे रात...
जैसे बिना आवाज़ की बारिश...
पर फिर भी वो भीगता है सब कुछ —
यादें, तकिए, पुराने कपड़े, टूटी चीज़ें...
और फिर एक सुबह...
तुम्हारा हाथ अचानक मेरे हाथ में होता है।
बिना वजह... बिना वजह सबसे सुंदर।"
करण ने उसे देखा — जैसे पहली बार देखा हो।
“संध्या…”
“हूँ?”
“हमारे पास जो है, वो हर रोज़ लिखा जाएगा — तुम मेरी कविता हो। और मैं... तुम्हारा पाठक।” संध्या ने धीरे से अपना सिर उसकी कंधे पर टिका दिया। और उस रात — कोई कैक्टस नहीं था, कोई गुलाब नहीं। बस चुप्पी थी, धड़कनों की। और एक साथ होने का एहसास।
अध्याय 4: धुंध में छुपे हुए सितारे
(करण और संध्या की कहानी का अगला पन्ना)
"कुछ रिश्ते धुंध की तरह होते हैं... जो साफ़ होते ही पता चलता है, सितारे वहीं थे। बस थोड़ी देर के लिए छुप गए थे।"
उपयुक्त पाठकों के लिए:
जो पाठक मानव संबंधों की जटिलता, विवाह के भीतर के सूक्ष्म बदलाव, और भावनात्मक पुनर्संवाद की कहानियों को सराहते हैं, उनके लिए यह एक संवेदनशील और आत्मा को छूने वाली कथा है।
कमेंट प्लीज...
अगर कमेंट आये तो अगला पार्ट भी जल्दी आयेगा 😁😁
हैव ए गुड डे😊
Nice
ReplyDeleteLajwab
ReplyDeleteबहुत खूब 👍
ReplyDeleteLajwab
ReplyDeletenice
ReplyDelete