शीर्षक: "चाय के कप में बचा हुआ प्यार"
(एक रिश्ते की ठहरी साँझ में जागती नई सुबह की कहानी )
लेखक: सत्यम कुमार सिंह
अध्याय 5: हँसती हुई आँखें और एक छोटा सा सच
(करण और संध्या की कहानी का अगला पन्ना)
"सच्चाई कभी-कभी छोटी होती है... पर उसका स्वाद बड़ा होता है। जैसे चाय की आखिरी बूँद में छुपी मिठास।"
सुबह का अंधेरा अभी पूरी तरह छँटा नहीं था, और अलार्म की सुइयाँ भी तय समय पर पहुँचने से पहले थमी थीं, लेकिन संध्या की नींद टूट चुकी थी। उसकी पलकों पर भारीपन था, पर मन किसी अदृश्य बोझ से दबा हुआ लग रहा था। साँसें अनियमित थीं, माथे पर हल्का पसीना और हृदय की गति जैसे किसी अनकहे डर की स्याही से भीगी हुई थी।
वह चुपचाप बिस्तर से निकली, जैसे कोई डरावना सपना पीछे से खींच रहा हो। खिड़की तक पहुँची तो देखा — बाहर एक हल्की धुंध पसरी हुई थी। आसमान अभी नीला नहीं हुआ था, लेकिन धूप के आने की तैयारी चल रही थी। सर्दियों की सुबह में एक चुप्पी थी, जो भीतर की बेचैनी से मेल खा रही थी।
उसके सपने की स्मृति अब भी ताज़ा थी — करण उससे दूर जा रहा था, और वह उसकी ओर हाथ बढ़ाए उसे रोकने की कोशिश कर रही थी, मगर कोई आवाज़, कोई चीख़ उसकी साँसों से बाहर नहीं आ पा रही थी। वह बेतहाशा रो रही थी, मगर करण की पीठ धीरे-धीरे धुंध में गुम होती जा रही थी।
"क्या हुआ?"
एक धीमी, अधनींद भरी आवाज़ पीछे से आई। करण ने आँखें पूरी तरह नहीं खोली थीं, पर उसकी अनुभूति जाग चुकी थी।
"कुछ नहीं... बस पानी पीने आई थी," संध्या ने तुरंत उत्तर दिया। आवाज़ स्थिर थी, पर करण को धोखा नहीं दे सकी। वह जानता था — संध्या जब अपनी भावनाओं को छुपाती है, तो उसकी आवाज़ में एक किस्म की कृत्रिम शांति उतर आती है।
करण उठकर खड़ा हुआ और धीरे से उसके पास आया। बिना कुछ कहे उसने उसका कंधा थाम लिया।
"मैं यहीं हूँ," उसने बस इतना कहा।
इस तीन शब्दों की सादगी में जो गहराई थी, वह किसी भी सफाई, किसी भी तसल्ली से बड़ी थी। संध्या ने उसकी ओर देखा — उसकी आँखों में वही ईमानदारी, वही स्नेह, वही मौन-सा विश्वास, जो पहली बार में उसे उसके करीब ले आया था। धूप अब धीरे-धीरे पर्दों की सिलवटों से कमरे में दाखिल हो रही थी — जैसे उनका मौन संवाद रोशनी में बदल रहा हो।
हर सुबह का एक स्वरूप होता है — एक लय, एक कोलाहल, एक सुवास। आज की सुबह की रचना बच्चों के हँसी-ठिठोली से सजी थी। रसोई से अदरक और इलायची की चाय की खुशबू उठ रही थी, जबकि डाइनिंग टेबल पर 'सच या झूठ' का खेल चल रहा था। "मम्मा! तुम्हारी बारी!" नीता ने अपनी प्याली में चम्मच घुमाते हुए उत्साह से कहा।संध्या, जो अभी तक रसोई से कपों में चाय डाल रही थी, मुस्कुराते हुए मेज पर आई। "ठीक है... सच," उसने जवाब दिया। "क्या तुमने कभी पापा को गुस्से में तकिया फेंककर मारा है?" आर्यन ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से सीधे उसकी ओर देखकर पूछा।
एक पल को जैसे हवा थम गई। करण, जो अब तक अख़बार के पीछे छुपा बैठा था, एकदम सतर्क हो गया। फिर कमरा बच्चों की हँसी से गूँज उठा। संध्या थोड़ी झिझकी, फिर हँसी के साथ सिर हिलाया, "हाँ... एक बार, जब तुम दोनों छोटे थे। तुम्हारे पापा तीन दिन तक मुझसे बिना बात किए रहे।" नीता और आर्यन की उत्सुकता बढ़ गई। "फिर?" नीता ने पूछा। "फिर मैंने तकिया फेंका। लेकिन निशाना चूक गई। तकिया सीधे दीवार से टकराया। और तुम्हारे पापा हँस पड़े।" करण ने अब तक चाय का घूँट लिया था और मुस्कुराते हुए बोला, "उस दिन मुझे एहसास हुआ कि तुम कितनी बुरी निशानेबाज़ हो।" संध्या ने उसकी ओर देखकर कहा, "पर तुम्हारी चुप्पी तोड़ने के लिए इतना ही काफी था।"
ये छोटी-छोटी स्मृतियाँ, इनका दोहराव — यही तो रिश्तों की मिट्टी में खाद का काम करते हैं। एक तकिया, एक चूक, एक हँसी — और एक संबंध फिर से बोलने लगता है।
दोपहर की नमी में जब बच्चे स्कूल चले गए थे, करण ने वह पुरानी डायरी निकाली जो सुशीला माँ ने दी थी — संध्या के पिता की लिखी हुई। उसमें समय के साथ जमी हुई स्याही थी, और जीवन के कुछ कोमल, कुछ अनकहे टुकड़े।
एक पन्ने पर लिखा था:
"आज संध्या ने पहली बार चाय बनाई... और चीनी की जगह नमक डाल दी। जब मैंने पिया तो मुँह बनाया, पर उसकी खुशी देखकर पूरा कप पी गया। कभी-कभी प्यार झूठ बोलना भी सिखा देता है।"
करण मुस्कुराया। उसमें अपने ससुर की सरलता, संध्या के बचपन की झलक और एक पिता के अंतस की झलक मिल गई थी। वह संध्या के पास गया। "तुम्हें पता है, तुम्हारे पापा ने तुम्हारी पहली चाय के बारे में क्या लिखा है?" संध्या ने डायरी ली और पढ़ा। उसकी आँखों में चमक आ गई — वो भुला हुआ दृश्य फिर से जीवंत हो गया। "मैं तो भूल ही गई थी... पर पापा ने कभी बताया नहीं कि चाय खराब थी।" करण ने मुस्कराते हुए कहा, "क्योंकि वह तुम्हारे प्यार का स्वाद लेना चाहते थे... चाहे वह नमकीन हो या मीठा।"
संध्या ने डायरी पलटते हुए एक और पन्ना खोला और उसका चेहरा गंभीर हो गया। "क्या हुआ?" करण ने चिंतित होकर पूछा। "यह देखो..." वह पन्ना दिखाते हुए बोली:
"आज डॉक्टर ने कहा... दिल की बीमारी बढ़ रही है। संध्या को नहीं बताना। वह अपनी परीक्षाओं की तैयारी कर रही है।"
संध्या के हाथ काँपने लगे। उसकी आँखों में एक ऐसा आँसू था जो बरसों से थमा हुआ था — अब फूट पड़ा था। "मुझे नहीं पता था... उन्होंने कभी नहीं बताया।" करण ने उसके काँपते हाथ थाम लिए। "शायद इसीलिए तुम्हारी माँ ने ये डायरी मुझे दी। ताकि तुम जान सको... कि कभी-कभी प्यार में छुपाना भी ज़रूरी हो जाता है।"
उस क्षण संध्या को किसी और की ज़रूरत थी — जो उसे उस पृष्ठभूमि में वापस ले जाए जहाँ ये सब लिखा गया। उसने फ़ोन उठाया और अपनी माँ को कॉल किया।
"मम्मा... पापा की डायरी मिली," उसकी आवाज़ काँप रही थी।
दूसरी ओर एक गहरी चुप्पी थी। फिर सुशीला की शांत, पर गहराई से भरी आवाज़ आई: "मैं जानती थी कि एक दिन तुम्हें सब पता चलेगा।"
"आप लोगों ने मुझसे क्यों छुपाया?"
"क्योंकि तुम हमारी बेटी हो... और बेटियाँ जब टूटती हैं, तो माँ-बाप की आत्मा भी चटक जाती है। तुम्हारे पापा कहते थे — जब प्यार बड़ा होता है, तो दर्द छोटा लगता है।"
संध्या की आँखों से आँसू निकल पड़े। एक बूँद डायरी के उसी पन्ने पर गिरी, जहाँ लिखा था:
"संध्या आज स्कूल मे फर्स्ट आई है... मेरा दिल गर्व से भर गया। अगर यही मेरी आखिरी खुशी हो, तो भी काफी है।"
उस बूँद में वर्षों का अनकहा संवाद था। पिता की मुस्कान, माँ की चुप्पी और बेटी की बेचैनी — सब एक कतरे में समा गए थे।
शाम के सन्नाटे में करण ने चाय बनाई — अदरक वाली, थोड़ी कड़क, बिल्कुल वैसी जैसी संध्या को पसंद थी। उसके स्वाद में एक स्मृति थी, एक प्रस्ताव भी।
"मैंने सोचा... हमें एक नई डायरी शुरू करनी चाहिए। जिसमें हम हर रोज़ कुछ सच्ची बातें लिखें।"
संध्या ने उसकी ओर देखा। "पर कभी-कभी सच दुख देता है।"
करण ने मुस्कुराकर कहा, "पर झूठ से तो बेहतर है। मैं वादा करता हूँ, अब कुछ नहीं छुपाऊँगा। चाहे वो मेरी नौकरी की चिंता हो या तुम्हारी बनाई बेस्वाद खिचड़ी।"
संध्या हँसी, फिर अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया। "और मैं वादा करती हूँ... अगली बार तकिया नहीं फेंकूँगी, सीधे कहूँगी।"
करण ने उसकी ओर देखकर कहा, "पर एक शर्त पर — तुम हर दिन मुझसे एक छोटा सा सच माँगोगी।"
"जैसे?"
"जैसे — आज तुम्हारी हँसी मुझे पुराने दिनों की याद दिला गई।"
संध्या ने अपनी आँखें झुका लीं, पर होठों पर हँसी तैर रही थी। करण ने उसकी नाक को हल्के से छुआ, "आज तुम्हारी आँखों के नीचे जो छोटा सा तिल है, वो बहुत प्यारा लगा। खासकर जब तुम हँसी थीं।" उस रात, एक नई डायरी का पहला पन्ना लिखा गया:
"आज हमने सीखा कि सच्चाई कभी छोटी हो सकती है, पर उसका प्यार बड़ा होता है। जैसे चाय की आखिरी बूँद में छुपी मिठास... जो गले से उतरकर दिल तक पहुँचती है।" उसके नीचे दो हस्ताक्षर थे — करण और संध्या के। और एक वादा — अब कोई बात छुपाई नहीं जाएगी। सिर्फ सच होंगे। छोटे या बड़े — पर पूरी तरह अपने। रात के सन्नाटे में जब दोनों ने अपनी नई डायरी का पहला पन्ना पूरा किया, तो कमरे में एक अजीब-सी शांति भर गई थी — न थकी हुई, न भारी... बस मौन, जिसे शब्दों की ज़रूरत नहीं थी।
संध्या अब भी डायरी को थामे बैठी थी, जैसे वह उस आखिरी वाक्य को अपनी हथेलियों में महसूस कर रही हो।करण ने धीरे से कहा, "क्या तुम्हें याद है, उस पुराने संदूक की दराज़ जिसमें तुम्हारी मम्मी ने तुम्हारे पापा की चीज़ें समेट कर रख दी थीं? संध्या ने सिर हिलाया। "हाँ... जो माँ कभी खोलती नहीं थीं।"
"मैं सोच रहा था... शायद अब वक़्त है," करण ने धीरे से कहा।
अगली सुबह, जब धूप कमरे की दहलीज़ पर नर्म कदमों से उतरी, संध्या और करण ने मिलकर उस पुरानी संदूक की दराज़ खोली — जैसे समय की किसी भट्टी से भूले हुए टुकड़े निकाल रहे हों।
कपड़ों की तह के नीचे, एक पुराना रबरबैंड बंधा बंडल निकला — जिसमें चिट्ठियाँ थीं। हाथ से लिखी हुई, धुँधली स्याही से भरी। कुछ पिता की थीं, कुछ माँ की ओर से पिता को... और कुछ — संध्या के लिए लिखी गई थीं, पर कभी दी नहीं गईं।
पहली चिट्ठी पर लिखा था:
"मेरी गुड़िया के नाम — जिसे मैं कभी तकलीफ़ में नहीं देखना चाहता..."
संध्या ने काँपते हाथों से लिफ़ाफ़ा खोला, और पढ़ना शुरू किया।
"प्रिय संध्या,
शायद जब तुम यह पढ़ रही हो, मैं वहाँ नहीं हूँ।
तुम्हें लगता होगा, मैं कमज़ोर था, जो तुम्हें कुछ नहीं बताया... पर बेटी, कभी-कभी सच्चाई कहने के लिए ताक़त नहीं, बहुत गहरा विश्वास चाहिए होता है कि सामने वाला उसे सह सकेगा।
मैंने तुमसे कुछ नहीं छुपाया, सिर्फ वो हिस्सा रखा जो तुम्हारे पंखों को वक़्त से पहले बोझिल न कर दे।
मेरी हर धड़कन में तुम थीं। तुमने मेरी दुनिया को रौशनी दी — नमकीन चाय की वो पहली घूँट भी मेरी सबसे मीठी याद बन गई।
जब कभी लगे कि मैं दूर हूँ... बस ये याद रखना — मेरा प्यार हमेशा तुम्हारे आसपास रहेगा।
_पापा"
संध्या की आँखें बरस पड़ीं। चिट्ठी अब भी थरथरा रही थी — जैसे उसमें किसी अधूरी बातचीत की साँसें थीं। करण ने उसका हाथ थामा, कुछ नहीं कहा — क्योंकि उस पल शब्दों की कोई जगह नहीं थी। उसी बंडल में एक और चिट्ठी थी — जिसे देखकर संध्या ठिठकी। उस पर लिखा था:
"सुशीला के लिए — जो मेरे हर दर्द की पहली दवा रही।"
संध्या ने वह चिट्ठी अलग रख दी। "मम्मा को भेज दूँ?" उसने पूछा। करण ने सिर हिलाया। "नहीं... कल शाम को हम दोनों साथ चलेंगे। और साथ बैठकर पढ़ेंगे — क्योंकि कुछ बातें अकेले नहीं, परिवार के साथ बाँटनी चाहिए।"
शाम को जब करण और संध्या बालकनी में बैठे थे — हाथ में वही डायरी और सामने ढलती रोशनी — करण ने धीरे से पूछा, "तुम आजकल कुछ ज़्यादा चुप रहने लगी हो... डायरी के बाद से।" संध्या ने हल्के स्वर में कहा, "कुछ बातें ऐसी होती हैं जो बाहर आकर चुप हो जाती हैं... जैसे मेरे भीतर कोई पुराना कमरा खुल गया हो, जहाँ पापा की हर बात अब गूँज रही है।"
करण ने उसकी ओर देखा, "तो अब क्या करोगी?" संध्या ने मुस्कुराकर कहा, "शायद अब उस कमरे की सफ़ाई करूँगी... और उसमें कुछ नई यादें जोड़ूँगी। ताकि जब हमारी नीता या आर्यन कभी पीछे मुड़ें, तो उन्हें भी हमारा प्यार ऐसे ही किसी बंडल में मिले।" करण ने उसकी ओर झुककर कहा, "तो फिर आज की चाय मैं बनाता हूँ। पहली बार बिना चीनी के... क्योंकि शायद नमक में भी अब कुछ मिठास ढूँढी जा सकती है।"
रात को डायरी का अगला पन्ना लिखा गया:
"आज हमने जाना कि कुछ सच्चाइयाँ देर से मिलती हैं, पर हमेशा सही वक़्त पर आती हैं। और जब कोई पुराना दर्द शब्द बनकर सामने आता है, तो उसका सामना अकेले नहीं, साथ मिलकर करना चाहिए।"
पन्ने के नीचे एक नई बात जोड़ी गई: "आज की चाय — बिना चीनी के, पर प्यार में डूबी हुई। और उसमें एक नई चिट्ठी की शुरुआत भी।"
अगले दिन सुबह… संध्या बालकनी में बैठी थी — हाथ में वही डायरी, आँखों में पुरानी यादों की परछाइयाँ। करण अंदर से चाय लेकर आया। कप रखते हुए उसने कहा, "आज बहुत ठंडी हवा चल रही है।" संध्या ने बिना देखे कहा, "पर मन में आज कुछ गर्म-सा लग रहा है। जैसे पापा की चिट्ठियाँ अंदर की ठंड को पिघला गई हों।" करण ने धीमे स्वर में पूछा, "क्या तुमने मम्मा से वो चिट्ठी पढ़ी?"
"हाँ," संध्या ने सिर हिलाया, "कल रात पढ़ी... माँ की आँखों में भी वही नमक था, जो पापा की चाय में था —चुपचाप, मगर जरूरी।"
"क्या कहा उन्होंने?"
"बस इतना — ‘मैंने वो चिट्ठी बहुत बार पढ़ी, पर कभी ज़ोर से नहीं पढ़ पाई।’"
करण चुप रहा। दोनों ने साथ बैठकर चाय पी — वही बिना चीनी वाली, पर आज उसमें नमक नहीं था... उसमें कुछ और था — समझदारी, स्वीकार, और साथ में होने का गहरा स्वाद।
दोपहर में… नीता और आर्यन अपने स्कूल प्रोजेक्ट के लिए घर की पुरानी चीज़ें खोज रहे थे। तभी नीता को संदूक से एक पुराना कैसेट प्लेयर मिला। "मम्मा! ये क्या है?" उसने उत्साह से पूछा। संध्या ने उसे देखकर कहा, "ये तुम्हारे नाना की आवाज़ है... कभी रिकार्ड की थी मैंने।"
"क्या हम सुन सकते हैं?" आर्यन ने पूछा।
करण ने संध्या की ओर देखा — उसकी आँखों में एक अनकहा डर था, जैसे आवाज़ सुनकर कुछ और टूट जाएगा। लेकिन फिर उसने सिर हिलाया, "हाँ... सुनो।" कैसेट चालू हुआ।
“...और आज संध्या ने पहली बार स्कूल में मंच पर कविता पढ़ी। मेरी बेटी अब शब्दों से खेलने लगी है — जैसे उसकी माँ अपनी चुप्पियों से खेलती थी…”
संध्या की आँखों में आँसू थे, पर मुस्कान भी। बच्चों को नहीं समझ आया कि मम्मा रो रही हैं या हँस रही हैं — पर उन्होंने दोनों हाथों से उन्हें पकड़ लिया। करण ने उनके सिर पर हाथ रखा — जैसे आज एक और कड़ी जुड़ गई हो उस रिश्ते की ज़ंजीर में, जिसे वक्त ने थोड़ी देर के लिए ढीला छोड़ दिया था।
रात में, डायरी का एक और पन्ना जुड़ा:
"आज हमने जाना कि पुरानी आवाज़ें कभी खत्म नहीं होतीं... वो सिर्फ धुँध में छुप जाती हैं। और जब वक्त आता है, तो किसी पुराने प्लेयर से बाहर निकलकर हमारे दिल की दरारों को भर जाती हैं।" नीचे लिखा गया: "आज की चाय — बच्चों के साथ, पापा की आवाज़ के साथ, और उन यादों के साथ, जो अब डर नहीं देतीं... बस अपनी जगह माँगती हैं।"
अगली सुबह... घर में हलचल थी, पर उस हलचल में एक खास तरह की नमी थी — जैसे दीवारें भी अब चुपचाप सुन रही थीं, और समय अपनी बाँहों में बीते हुए को समेट रहा था। संध्या रसोई में थी — हाथ में चाय का छन्ना, पर नज़रें खिड़की के उस कोने पर टिक गई थीं जहाँ अक्सर पापा बैठा करते थे, अख़बार पढ़ते हुए, चुपचाप। करण पीछे से आया, उसके कंधे पर हाथ रखा। "कल शाम को मम्मा के पास चलें?" उसने धीरे से पूछा। संध्या ने गर्दन घुमाई। उसकी आँखें भीगी थीं, पर उनमें कोई शिकायत नहीं थी। "हाँ... शायद अब वक़्त है कि वो चिट्ठी मम्मा की आँखों के सामने रखी जाए, जहाँ उसने बरसों से सिर्फ इंतज़ार देखा है।"
मौसम में हल्की ठंडक थी। आँगन की तुलसी के पास एक दीपक जल रहा था, और घर में वो चुप्पी थी जो अक्सर अकेलेपन में पलती है। करण और संध्या ने दरवाज़ा खटखटाया। सुशीला ने खोला — एक धीमी मुस्कान, और आँखों में गहराई। "आओ," उन्होंने बस इतना कहा। बैठक में तीन कप चाय रखी गईं — एक वो जो अब कभी नहीं उठाया जाएगा, पर उसकी जगह अभी भी सजी हुई थी। संध्या ने धीरे से चिट्ठी माँ के हाथ में रखी — वही लिफ़ाफ़ा, वही कांपती स्याही।
सुशीला ने उसे देखा... खोला नहीं। "तुम पढ़ोगी?" उसने संध्या से पूछा। संध्या चुप रही, फिर धीरे से सिर हिलाया। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर शब्दों में वो साहस था जो वर्षों के संकोच से जन्मा था।
"सुशीला के लिए — जो मेरे हर दर्द की पहली दवा रही..."
शब्द कमरे में तैरने लगे — धीमे, गहरे, जैसे हर वाक्य कोई पुराना दरवाज़ा खोलता जा रहा हो।
"तुम्हारे बिना मैं अधूरा था, यह जानने में देर लगी। पर जब जाना, तब तुम पहले ही मेरा सब कुछ बन चुकी थीं।"
"संध्या जब हँसती है, तो उसमें तुम्हारी आँखें चमकती हैं। और जब चुप होती है, तो तुम्हारी चुप्पी बोलती है।"
"अगर कभी तुम यह चिट्ठी पढ़ रही हो, तो समझ लेना कि मैं अब भी तुम्हारे पास हूँ — हर चाय की सुगंध में, हर साँझ की खामोशी में, और उस बेटी की आँखों में जो हमारी दोनों की सबसे सच्ची रचना है।"
सुशीला की आँखों से आँसू नहीं गिरे — वे बस वहीं ठहर गए, जैसे उन्हें गिरने की इजाज़त भी चिट्ठी से ही लेनी हो।करण ने धीरे से उनका हाथ थामा। "आपने बहुत कुछ सँभाल कर रखा, मम्मा... अब थोड़ा हमारे साथ बाँटिए।" संध्या ने पुरानी संदूक में से वो कैसेट निकालकर मम्मा को दे दिया था — "शायद अगली बार जब आप अकेली हों, तो पापा की आवाज़ के साथ बैठिए... डर नहीं लगेगा।" करण ने बच्चों को सुलाया और जब बालकनी में लौटकर आया, तो संध्या को डायरी लिखते हुए पाया। "क्या लिख रही हो?" उसने पूछा। संध्या ने कलम रोकी, और मुस्कुरा दी। "बस एक वाक्य — 'पापा चले गए थे, पर उनका प्यार कभी नहीं गया। और मम्मा ने जो छुपाया, वो अब मेरे भीतर बोलने लगा है।'" करण ने वह डायरी बंद की और धीरे से कहा, "चलो, आज की चाय अब मैं बनाता हूँ — थोड़ी मीठी, थोड़ी कड़वी... बिल्कुल हमारे रिश्ते जैसी।"
"आज हमने जाना कि माँ-बाप की चुप्पियाँ भी कभी-कभी सबसे बड़ी चिट्ठियाँ होती हैं — जो बिना खोले ही पढ़ी जा सकती हैं, अगर पढ़ने वाला सच्चे मन से देखे।"
अगली सुबह...करण ने जब दरवाज़ा खोला, तो अख़बार के नीचे एक लिफ़ाफ़ा रखा था — माँ के हाथ की लिखावट में। उसने संध्या को बुलाया। "यह देखो..." उसने धीरे से कहा। लिफ़ाफ़े के अंदर एक छोटी चिट्ठी थी, संध्या के नाम:
"बिटिया,
पापा की चिट्ठियाँ तो तुमने पढ़ लीं... पर एक बात जो उन्होंने कभी नहीं लिखी, वो मैं बताना चाहती हूँ।
तुम जब रोती थीं, वो चुप हो जाते थे — क्योंकि उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी तुम्हारी आँखें थीं।
और जब तुम मुस्कुराती थीं, तो कहते थे — 'अब दुनिया जीती जा सकती है।'
अब जब तुम माँ बन गई हो, तो समझोगी — कि एक बेटी की मुस्कान, एक पिता की सबसे बड़ी जीत होती है।
बस ये मुस्कान बनाए रखना।
ताकि उनकी चाय अब भी तुम्हारे कप में कुछ मिठास घोलती रहे।
– मम्मा"
संध्या ने चिट्ठी को छाती से लगाया। और उस पल, जैसे किसी पुराने आशीर्वाद ने चुपचाप उसके सिर पर हाथ रख दिया हो।
रात को करण और संध्या बालकनी में बैठे थे — आज कोई शब्द नहीं बोले जा रहे थे। सामने नीता और आर्यन अपने स्कूल प्रोजेक्ट में "परिवार की विरासत" पर स्लाइड बना रहे थे। आर्यन ने पूछा, "पापा, विरासत का मतलब सिर्फ पैसा होता है?" करण ने धीमे से जवाब दिया, "नहीं बेटा... विरासत वो होती है जो दिल से दी जाती है। जैसे दादाजी की चिट्ठियाँ, तुम्हारी मम्मी की डायरी... और हमारी चाय की प्याली में बची वो छोटी-सी सच्चाई।"
नीता ने चुपचाप उस स्लाइड में एक टाइटल जोड़ा:
"हमारी विरासत — एक कप चाय और बहुत सारा प्यार।"
"आज हमने जाना कि विरासत कभी सिर्फ तिजोरी में नहीं रहती — वह उन चिट्ठियों में होती है जो समय पर खुलती हैं, उन आँखों में होती है जो बरसों तक रोने से खुद को रोकती हैं, और उस कप में होती है जिसमें चाय ठंडी हो जाए, पर उसका प्यार कभी न बासी हो।
उपयुक्त पाठकों के लिए:
जो पाठक मानव संबंधों की जटिलता, विवाह के भीतर के सूक्ष्म बदलाव, और भावनात्मक पुनर्संवाद की कहानियों को सराहते हैं, उनके लिए यह एक संवेदनशील और आत्मा को छूने वाली कथा है।
कमेंट प्लीज...
अगर कमेंट आये तो अगला पार्ट भी जल्दी आयेगा 😁😁
हैव ए गुड डे😊
लाजवाब
ReplyDeleteमैने सभी अध्याय पढ़ा है सभी प्रेम से पहचान करा रही है अब अगली अध्याय का इंतज़ार है
ReplyDeleteNext part please
ReplyDelete👌 osm
ReplyDelete😍😍😍❣️❤️
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