चाय के कप में बचा हुआ प्यार

 शीर्षक: "चाय के कप में बचा हुआ प्यार"

      (एक रिश्ते की ठहरी साँझ में जागती नई सुबह की कहानी )

लेखक: सत्यम कुमार सिंह


अध्याय : 1. अधूरी हँसी में छुपा प्यार

"कभी-कभी प्यार वापस नहीं आता... क्योंकि वो गया ही नहीं था।"


tum main aur do cup chai

 

कभी-कभी रिश्ते चाय की तरह हो जाते हैं — रोज़ बनते हैं, रोज़ पीते हैं, लेकिन एक दिन अचानक वही चाय कुछ खास लगने लगती है। शायद उसमें वही सब कुछ होता है जो रोज़ था — वही पानी, वही पत्ती, वही दूध — लेकिन उस दिन उसे बनाने वाले के इरादे में एक बदलाव होता है। वही बदलाव अब करण और संध्या के घर की हवा में था। यह कहानी सिर्फ दो लोगों की नहीं है — यह हर उस रिश्ते की कहानी है जिसे बस "थोड़ी सी कोशिश" चाहिए।


शहर की साँझ अब धीरे-धीरे रात की ओढ़नी ओढ़ रही थी। दिसंबर के पहले हफ्ते की वो भीगी-भीगी हवा थी, जो साँसों को भीतर तक छू जाती है — और कभी-कभी, उन यादों को भी कुरेद देती है जो सालों से जमी हुई थीं, पर अब भी कहीं भीतर गर्म थीं।

वो एक सामान्य-सी रात थी — बाहर हल्की बारिश थी, खिड़कियों पर बूंदों की थपकियाँ थीं, और कमरे के भीतर हीटर की हल्की सी भनभनाहट। पर सब कुछ ‘सामान्य’ होते हुए भी असामान्य-सा लग रहा था। संध्या खिड़की के पास बैठी थी — वही खिड़की जहाँ वो और करण कभी साथ बैठा करते थे, अपने सपनों की चाय में ख्वाबों की पत्तियाँ डालते हुए, भविष्य की चीनी घोलते हुए। अब वहाँ बस धुंध थी — बाहर भी और भीतर भी।

उसकी गोद में एक किताब खुली पड़ी थी, लेकिन उसके शब्द किसी और ही पन्ने की तलाश में थे — शायद रिश्ते के उस अध्याय की, जो अधूरा छूट गया था।

तभी करण की आवाज़ आई — “चाय लोगी?”

वही आवाज़, जो कभी सुबह की सबसे प्यारी शुरुआत हुआ करती थी, अब बस एक औपचारिकता बनकर रह गई थी।

संध्या ने बिना उसकी ओर देखे कहा, “नहीं, अभी नहीं।”

उसके शब्दों में ठंडक नहीं थी, लेकिन गर्माहट भी नहीं थी। वो एक थकी हुई आवाज़ थी — जैसे किसी बहुत लम्बी यात्रा के बाद अब रुकने की इच्छा भी खो चुकी हो।

करण किचन में चुपचाप बर्तन समेट रहा था। वो भी जानता था कि कुछ तो टूटा है, पर उस टूटन की आवाज़ कभी सुनाई नहीं दी थी — जैसे कोई काँच महीनों से धीरे-धीरे दरक रहा हो, और हम उसे दरकिनार करते रहें यह सोचकर कि ये बस थकावट है।

शादी को आठ साल हो चुके थे। दो बच्चे, एक ठीकठाक जीवन, EMI, स्कूल की मीटिंग्स, ऑफिस की थकावट — सब कुछ अपने ‘सिस्टम’ में चल रहा था। लेकिन इस सिस्टम के भीतर कहीं कुछ असंतुलित था — जैसे दो धुरी घूम रही थीं, पर अब एक-दूसरे को छूती नहीं थीं।

करण ने कई बार कोशिश की थी, कुछ कहने की, कुछ समझने की, लेकिन हर बार शब्द गले में अटक जाते। वो जानता था कि संध्या बदल गई है। लेकिन वो ये नहीं समझ पाया था कि संध्या बदली नहीं थी — वो थक गई थी।

बच्चे उस शाम अपने नानी-नाना के घर थे। घर में अजीब-सी खामोशी थी — ना खिलखिलाती हँसी, ना कार्टून की आवाज़ें, ना खाने की ज़िद। बस एक साँय-साँय करती चुप्पी, जो बहुत कुछ कह रही थी।

करण ने उस चुप्पी में पहली बार सीधा सवाल पूछा — “हम ठीक हैं ना?”

वो सवाल नहीं था — वो एक टूटी हुई आत्मा का स्पर्श था।

संध्या कुछ पल चुप रही। फिर हल्के स्वर में बोली, “हम ठीक लगते ज़रूर हैं, पर शायद नहीं हैं।”

उसने करण की ओर देखा नहीं, लेकिन वो जानती थी कि उसकी ये बात करण के भीतर तक उतर गई थी।

करण धीरे से आया, संध्या के पास ज़मीन पर बैठ गया। उसकी आँखों की ऊँचाई तक आया — वो जो बरसों से दूर हो गई थी।

उसने संध्या का हाथ थामा — वही हाथ, जिसे थामे हुए उसने सात फेरे लिए थे, वही हाथ जिसे वो अब भूल चुका था।

“मैं नहीं चाहता कि हम ऐसे रहें,” उसने कहा।

“मैं फिर से कोशिश करना चाहता हूँ। हमारे लिए।”

संध्या की आँखें भर आईं — लेकिन वो आँसू दुःख के नहीं थे। वो उस बर्फ के पिघलने का संकेत थे, जो उनके बीच जमा था।

“मुझे डर लगता है,” उसने कहा।

“कहीं बहुत देर न हो गई हो।”

करण ने उसकी हथेली को थोड़ा और कस कर पकड़ा, जैसे कहना चाहता हो — ‘नहीं हुई है।’

“देर तब होती है जब हम रुक जाते हैं,” उसने कहा।

“अगर हम चलें, साथ-साथ, तो रास्ता फिर से बन जाएगा। धुंध साफ़ हो जाएगी।”

उस रात टीवी बंद रहा। मोबाइल की टन-टन नहीं बजी। कोई रील नहीं देखी गई।

करण ने रसोई में जाकर सब्ज़ियाँ काटीं, संध्या ने चपातियाँ बनाई — बरसों बाद उन्होंने साथ खाना बनाया। एक-दूसरे की आदतों को फिर से परखा, और फिर — चुटकी ली।

“तुम्हारा आलू आज भी सबसे बेकार है,” करण ने कहा।

“और तुम्हारा नमक अब भी डबल,” संध्या ने जवाब दिया।

और वे दोनों हँसे — वो हँसी जो प्लास्टिक की नहीं थी। वो हँसी जो सचमुच के जुड़ाव की होती है। वो जो किसी पुराने गाने की धुन-सी लौटती है — थकी हुई, पर सजीव।

रात को पहली बार दोनों ने एक ही कंबल ओढ़ा — जैसे ये बताने के लिए कि हम फिर से एक हैं, अगर पूरी तरह नहीं, तो कोशिश में तो ज़रूर।

सुबह जब करण ने चाय बनाई और साथ में दो बिस्किट रखे, तो संध्या ने नज़रें मिलाकर कहा — “धन्यवाद।”

करण मुस्कुराया।

फिर बोला — “हम फिर से कोशिश कर रहे हैं।”

‘हम’ — ये शब्द अब फिर से ज़िंदा था।

कभी-कभी प्यार किसी बड़े इशारे से नहीं लौटता। ना फूलों से, ना गिफ्ट्स से, ना सोशल मीडिया की पोस्टों से। वो लौटता है एक साधारण से कप में — गर्म चाय के साथ, जिसमें बचा होता है वही स्वाद, वही अपनापन, बस थोड़ी देर से पहचाना गया।

रिश्ते टूटते नहीं हैं — वो थक जाते हैं। और थके हुए रिश्तों को बस थोड़ी-सी गर्माहट चाहिए होती है। एक गले, एक हँसी, एक ‘हम’ कह देने की कोशिश।

रात फिर से आई। बारिश अब भी थी, पर संध्या के चेहरे पर एक नई धूप थी।

अगली सुबह उसने पहली बार खुद चाय बनाई। जब करण ने एक कप बढ़ाया, तो उसने बिना कहे दूसरा कप भी साथ रख दिया। करण ने देखा — उसमें वही स्वाद था, जो कभी था।

“बढ़िया बनी है,” उसने कहा।

“आज ज़रा कोशिश ज़्यादा की,” संध्या ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा। उन दोनों ने साथ चाय पी — उस कप से जिसमें अब भी प्यार बचा हुआ था।

"कुछ रिश्ते आवाज़ नहीं देते, बस मौजूद रहते हैं — ठीक वैसे ही जैसे धीमी आँच पर रखी चाय, जो उफनती नहीं, पर महकती रहती है।"

सुबह की चाय, जो कभी एक आदत बन चुकी थी, आज एक संकेत बन गई थी। करण और संध्या की आँखों में एक नया सवेरा था — वो जो सूरज की पहली किरण जैसा नहीं, बल्कि उन बादलों के पीछे छुपी रोशनी जैसा था जो धीरे-धीरे बाहर आना चाहती हो। दोनों बच्चों के वापस आने से पहले का वो वक़्त — शायद एक विराम था, एक ठहराव जिसमें फिर से चलने की हिम्मत जुड़ रही थी।

उस शाम, संध्या ने धीरे से कहा, “क्या हम थोड़ी देर छत पर बैठ सकते हैं?” ये कोई बड़ा आग्रह नहीं था, लेकिन करण समझ गया — यह एक खुली खिड़की थी उस कमरे की, जिसकी खिड़कियाँ कब की बंद हो चुकी थीं। छत पर कुर्सियाँ पड़ी थीं — धूल भरी, थोड़ी टूटी हुई — जैसे कुछ यादें। करण ने उन्हें झाड़ा, संध्या ने एक पुरानी चादर बिछाई। दोनों साथ बैठ गए। नीचे शहर की रौशनी झिलमिला रही थी — लेकिन उनके बीच अब भी थोड़ा अंधेरा था, जिसे वो दोनों मिलकर कम कर रहे थे। कुछ पल चुप्पी रही।

फिर संध्या ने धीमे से कहा, “तुम्हें याद है वो पहली बार जब तुमने मेरे लिए चाय बनाई थी?”करण मुस्कुरा पड़ा — “वो जिसमें मैंने चीनी डालना भूल गया था?” “हाँ,” संध्या हँसी, “और फिर तुमने कहा था — प्यार मीठा कर देगा।” दोनों मुस्कुरा दिए — जैसे किसी भूले हुए गीत का मुखड़ा अचानक याद आ गया हो। अब वो स्मृतियाँ नहीं थीं, शिकायतें नहीं थीं — वो रेशमी धागे थे, जिनसे फिर से बुनाई शुरू हो रही थी।

रात के खाने के बाद, करण ने पहली बार संध्या से कहा, “अगर हम चाहें तो हम काउंसलिंग के लिए भी जा सकते हैं। सिर्फ़ इसलिए नहीं कि कुछ टूट गया है, बल्कि इसलिए कि हम बचा सकें — उसे जो अब भी हमारे बीच है।” संध्या ने उसकी तरफ़ देखा — वो सुझाव किसी हार का नहीं, बल्कि कोशिश का संकेत था। आज करण एक पति से ज़्यादा, एक साथी लग रहा था — वो जो समझना चाहता है, सिर्फ़ निभाना नहीं। “चलो,” संध्या ने कहा। “पर सबसे पहले — हमें अपने बीच की चुप्पियों को बोलने देना होगा।”

रात को दोनों ने पुराने फोटो एल्बम निकाले। शादी की तस्वीरें, बच्चों के पहले जन्मदिन, हिल स्टेशन की छुट्टियाँ… और फिर कुछ ऐसी भी थीं जो बीच में ही छूट गई थीं। तस्वीरें तो पूरी थीं, लेकिन वो भाव गायब थे जो कैमरा पकड़ नहीं सका था।“हमारे बीच कभी प्यार गया ही नहीं था,” करण ने धीमे से कहा।“बस हम उसे देखना भूल गए थे।”

अगले दिन जब बच्चों की आवाज़ें घर में गूँजने लगीं, तो संध्या ने देखा — घर का माहौल बदला नहीं था, लेकिन उसका मन बदल चुका था। करण ने भी महसूस किया — आज काम पर निकलते हुए उसकी आँखें भारी नहीं थीं। संध्या ने पहली बार दरवाज़े तक आकर कहा — “जल्दी आना।”

वो 'जल्दी आना' बस एक वाक्य नहीं था — वो एक टुकड़ा था उस पुराने भरोसे का, जिसे अब फिर से जोड़ने की कोशिश हो रही थी।

दिन बीतते जा रहे थे। कोई चमत्कार नहीं हुआ था — ना कोई फिल्मी मोड़, ना किसी पुराने गाने की बैकग्राउंड म्यूज़िक। लेकिन कुछ बदल रहा था — बहुत धीमे, बहुत सधे क़दमों से।

अब संध्या फिर से सुबह जल्दी उठने लगी थी — बच्चों के टिफिन तैयार करते हुए, करण की शर्ट प्रेस करते हुए वो वही काम कर रही थी जो पहले करती थी, पर अब उसमें एक अंतर था — अब वो 'कर्तव्य' नहीं, 'साझेदारी' लगने लगा था। करण भी अब फ़ोन में कम, और संध्या की बातों में ज़्यादा दिलचस्पी लेने लगा था। एक शाम उसने पूछा —“आजकल फिर से कविताएँ लिख रही हो?” संध्या ने सिर हिलाया, “थोड़ी-थोड़ी।” करण ने मुस्कुराते हुए कहा —“कभी सुनाओ।”

वो ‘कभी’ कोई तारीख़ तय नहीं करता था, पर ये बात अपने आप में एक आमंत्रण थी — जैसे कोई कह रहा हो, ‘मैं अब भी सुनना चाहता हूँ।’

बच्चे पढ़ाई में व्यस्त थे। टीवी बंद था। कमरे में केवल पंखे की आवाज़ थी और हल्का-सा सन्नाटा। करण और संध्या बालकनी में बैठे थे। संध्या ने कहा, “तुम्हें लगता है, लोग फिर से प्यार करना सीख सकते हैं?” करण ने कुछ पल सोचा। “मुझे लगता है, प्यार करना नहीं सीखना पड़ता... प्यार को देखना और पहचानना पड़ता है। और हम... शायद अब उसे फिर से देख पा रहे हैं।” उस रात, जब करण ने चुपचाप संध्या के लिए गर्म दूध रखा, और वो बिना कुछ कहे पी गई — तब दोनों ने महसूस किया, शब्दों से ज़्यादा असर नियत करती है।

रविवार की दोपहर, बच्चों को पार्क में ले जाकर वापस लौटे तो घर थकान से भरा था — लेकिन शिकायत से नहीं, बल्कि उस तृप्ति से जो एक साथ बिताए वक़्त में आती है। संध्या ने करण से कहा —“मैं सोच रही हूँ, शायद हम फिर से एक साथ कहीं जा सकते हैं... अकेले... सिर्फ़ हम दोनों।” करण चौंका नहीं, लेकिन भीतर से कुछ पिघला ज़रूर। “चलेंगे,” उसने बस इतना कहा। अब करण जब ऑफिस से लौटता, तो वो ‘थका हुआ पति’ नहीं लगता था — वो एक ‘लौटता हुआ प्रेमी’ लगता था। एक शाम जब संध्या ने करण की पसंद का राजमा बनाया और उसने सिर्फ़ इतना कहा — “तुम्हारे हाथ का स्वाद कभी नहीं बदला” — तो वो तारीफ़ नहीं थी, वो सालों की दूरी को कम करने का एक प्रयास था। संध्या ने एक शाम उसकी डायरी में चुपचाप एक पंक्ति लिख दी —

“हम फिर से अनजाने बनें — और फिर से पहचानें।”

करण ने पढ़ा, और उसके पन्ने के नीचे जवाब लिखा —

“अनजाने नहीं, लेकिन अब फिर से क़रीब।”

एक रात, जब घर में सब सो चुके थे, करण ने अलमारी से कुछ निकाला — एक पुराना बॉक्स, जिसमें उनकी शादी की पहली सालगिरह पर संध्या ने उसे एक चिठ्ठी दी थी। उसने वो चिठ्ठी फिर से पढ़ी। फिर एक नया काग़ज़ निकाला, और लिखा —“तुमने मुझे एक बार पाया था — अब फिर से पाओ। इस बार मैं पूरी तरह मौजूद हूँ।”

वो चिठ्ठी उसने सुबह संध्या की चाय की ट्रे में रख दी। जब संध्या ने चाय पीते हुए वो पन्ना पढ़ा, तो उसकी आँखें नम हो गईं — लेकिन मुस्कान अब भी थी। प्यार लौट चुका था — ज़ोर से नहीं, लेकिन गहराई से।


Continue...

अध्याय 2 . नई सुबह, नई धूप

(संध्या और करण की कहानी का अगला पन्ना)

"कुछ रिश्ते टूटते नहीं... बस चुप हो जाते हैं। और फिर... किसी धीमी धूप में दोबारा बोलने लगते हैं।"

अध्याय 3: धूप में उगी हुई बारिश  

(करण और संध्या की कहानी का अगला पन्ना)  

"प्यार कभी खत्म नहीं होता... बस कभी-कभी बारिश की तरह छिप जाता है। और फिर धूप में चमक उठता है —बूँदों से इंद्रधनुष बुनकर।"

उपयुक्त पाठकों के लिए:

जो पाठक मानव संबंधों की जटिलता, विवाह के भीतर के सूक्ष्म बदलाव, और भावनात्मक पुनर्संवाद की कहानियों को सराहते हैं, उनके लिए यह एक संवेदनशील और आत्मा को छूने वाली कथा है।


कमेंट प्लीज...

अगर कमेंट आये तो अगला पार्ट भी जल्दी आयेगा ...वरना मैं अपनी मर्जी से लिखूंगा 😁😁

हैव ए गुड डे😊


3 Comments

  1. Anonymous6/23/2025

    Lajwab

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  2. Anonymous6/29/2025

    Nice 👍

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  3. Anonymous7/30/2025

    बहुत अच्छा लिखा है

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