तुम्हारे नाम की स्याही

 तुम्हारे नाम की स्याही


Tumhare naam ki syahi


तुम्हारे नाम की स्याही में खो जाऊँ,

हर दर्द को अपनी कविता में पिरो जाऊँ।

तेरे ख्यालों की महफ़िल सजाऊँ,

और अपनी तन्हाई से गीत बनाऊँ।


तेरी यादों की महक से बहार लिखूँ,

तेरे बिना इस दिल का सफ़र लिखूँ।

तुम्हारी हर बात को मैं किस्सों में बाँधूँ,

तेरे प्यार को अपनी रूह में चुभाऊँ।


रात की खामोशी में जब चाँद छुप जाए,

तेरे मुस्कान को उजाला लिखूँ।

मेरी डायरी के हर पन्ने पर,

तेरी हर खामोशी को सवालों में ढाल दूँ।


कभी जज़्बातों से भीगकर लिखूँ,

कभी यादों की नमी से सिलसिला लिखूँ।

तुम्हारे नाम से शुरू हो हर एक पंक्ति,

और हर अंत में मैं खुद को अकेला लिखूँ


तुम्हारे बिना जो अधूरापन है, उसे मैं पूरा कर दूँ,

अपने हर जज़्बात को तेरे लिए ही समर्पित कर दूँ।

तुम्हारे नाम की स्याही से हर ज़ख्म को चूम लूँ,

और खुद को तेरे प्यार की दास्तां में खो दूँ।


कभी ग़ज़ल बनकर तेरी रूह में उतरूँ,

कभी कविता बनकर तुझे महसूस करूँ।

तेरे होने का सबूत माँगे जो ये दुनिया,

मैं अपने हर एहसास को गवाही में लिखू


कभी ख़त में लिखूं तुझे, कभी दुआ में रखूं,

कभी पलकों पे आँसू, कभी होंठों पे रखूं।

मैं अधूरा हूँ आज भी, तेरे बिना कहीं,

पर जब भी लिखूं, तुझे मुकम्मल लिखूं।

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